
सीधी। मुख्यमंत्री Mohan Yadav के जिले में आगमन ने एक बार फिर प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हर बार की तरह इस बार भी वही पुराना ‘स्क्रिप्ट’ दोहराया गया—जैसे ही विरोध की आहट मिली, आवाज उठाने वालों को घरों में ही कैद कर दिया गया।
शिवसेना जिला इकाई के पदाधिकारियों को इस कदर नजरबंद किया गया मानो वे कोई अपराधी हों, जबकि उनका ‘गुनाह’ सिर्फ इतना था कि वे मुख्यमंत्री तक जनता की पीड़ा और समस्याओं का ज्ञापन पहुंचाना चाहते थे।
घर से बाहर कदम रखने पर पाबंदी,
शिवसेना प्रदेश उपाध्यक्ष विवेक पांडे, जिलाध्यक्ष बेनाम सिंह बघेल, नगर अध्यक्ष जैनेंद्र सिंह चौहान उर्फ मुन्ना, जिला महामंत्री आशीष मिश्रा, कोषाध्यक्ष लाल वर्मा और नगर सहसंयोजक राजन मिश्रा सहित कई शिवसैनिकों को उनके घरों में ही रोक दिया गया। प्रशासन ने ऐसा पहरा बिठाया कि कोई बाहर निकल ही न सके।
सवाल: क्या जनता की आवाज अब ‘खतरा’ बन गई है?
विवेक पांडे का साफ कहना है कि वे शांतिपूर्ण तरीके से मुख्यमंत्री के सामने जिले की जमीनी हकीकत रखना चाहते थे। इसमें शामिल थे:
DJ प्लाजा से प्रभावित गरीब परिवारों का दर्द
जिले में प्रशासनिक लापरवाही
कलेक्टर की कार्यशैली पर सवाल
जिला अस्पताल में भ्रष्टाचार,
लेकिन इन मुद्दों को उठाने से पहले ही ‘ताला’ लगा दिया गया—सीधे लोगों पर नहीं, उनकी आवाज पर।
लोकतंत्र या ‘कंट्रोल सिस्टम’?
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या अब लोकतंत्र में अपनी बात कहना भी अपराध बन गया है? अगर कोई संगठन शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना चाहता है, तो उसे रोकना किस कानून में लिखा है?
शिवसेना ने आरोप लगाया है कि यह सब सरकार के इशारे पर हुआ, ताकि जिले की असल तस्वीर मुख्यमंत्री तक न पहुंचे। यानी, मंच पर सब ‘ठीक-ठाक’ दिखे, और जमीन की सच्चाई पर्दे के पीछे ही दबी रह जाए।
आंदोलन की चेतावनी,
शिवसेना ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि अगर इसी तरह जनता की आवाज दबाई जाती रही, तो संगठन उग्र आंदोलन का रास्ता अपनाने से पीछे नहीं हटेगा।
सीधी की जनता अब सवाल पूछ रही है— क्या मुख्यमंत्री के दौरे सिर्फ दिखावे के लिए होते हैं?
क्या असली समस्याओं को छिपाना ही प्रशासन की प्राथमिकता बन चुकी है?
अगर यही हाल रहा, तो आने वाले समय में ‘नजरबंदी’ सिर्फ नेताओं की नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की होती दिखेगी।
