सीधी का जिला अस्पताल एक बार फिर सवालों के घेरे में है। यहां इलाज के नाम पर लापरवाही का ऐसा काला चेहरा सामने आया है, जिसने एक नवजात की जिंदगी निगल ली। यह कोई पहली घटना नहीं है—यही वजह है कि लोग कह रहे हैं, “ऐसे ही नहीं हुआ था कालिख कांड…”
पूरा मामला क्या है?
ग्राम नेबुहा थाना मझौली निवासी शतरूपा चंदेल को 1 अप्रैल को जिला अस्पताल में प्रसव के लिए भर्ती कराया गया। शाम करीब 7 बजे ऑपरेशन से बच्ची का जन्म हुआ। परिजनों के अनुसार बच्ची जन्म के समय पूरी तरह स्वस्थ थी, रो रही थी, लेकिन अस्पताल स्टाफ ने तुरंत उसे घंटे दो घंटे के लिए बोलकर आईसीयू में रखने की बात कहकर अलग कर दिया।
आईसीयू बना रहस्य का कमरा!
एक-दो घंटे की बात कहकर बच्ची को आईसीयू में रखा गया, लेकिन 2-3 दिन तक परिजनों को न तो दिखाया गया और न ही कोई स्पष्ट जानकारी दी गई। जब परिजनों ने बार-बार देखने की मांग की तो उन्हें टालमटोल किया गया,बच्ची को खतरे से बाहर बता कर अन्दर देखने समझने का मौका नहीं दिया गया।
जिला अस्पताल सीधी में डराया-धमकाया गया परिवार!
परिजनों का आरोप है कि जब उन्होंने बच्ची की हालत जानने और जरूरत पड़ने पर रेफर करने की बात कही, तो स्वास्थ्य कर्मियों ने उल्टा धमकाते हुए कहा— “ज्यादा परेशान करोगे तो पुलिस में आपकी शिकायत करेंगे”
फिर आधी रात को खेल, रेफर के नाम पर लीपापोती!
5-6 अप्रैल की दरमियानी रात करीब 2 बजे अचानक स्टाफ ने कहा कि बच्ची की हालत गंभीर है और उसे रीवा रेफर किया जा रहा है। जब बच्ची को परिजनों को सौंपा गया, तो उसके मुंह और शरीर से खून निकल रहा था।जो नवजात के कपड़ो में भी लगा था, परिजनों का कहना है कि उसी समय उन्हें अंदेशा हो गया था कि बच्ची अब जीवित नहीं है, लेकिन फिर भी उसे एंबुलेंस से रीवा भेज दिया गया।
रीवा पहुंचते ही सच आया सामने,,
रीवा पहुंचते ही डॉक्टरों ने बच्ची को मृत घोषित कर दिया। इससे साफ हो गया कि रेफर केवल औपचारिकता थी—जिंदगी तो पहले ही खत्म हो चुकी थी।
एंबुलेंस चालक का गैरजिम्मेदार रवैया,
परिजनों ने यह भी आरोप लगाया कि रीवा पहुंचने के बाद एंबुलेंस चालक उन्हें वहीं छोड़कर भाग खड़ा हुआ, जिससे उनकी परेशानी और बढ़ गई।जहां डॉक्टरों के द्वारा मृत घोषित कर दिया गया वही सीधी वापस लौटने के लिए वाहन के लिए भटकना शुरू हो गया था।
शिकायत के लिए भटके, पर कोई सुनवाई नहीं,
सीधी लौटने के बाद परिजन घंटों शिकायत के लिए भटकते रहे, लेकिन कोई जिम्मेदार अधिकारी सामने नहीं आया,
तीखा सवाल—जिम्मेदार कौन?
क्या आईसीयू में सही इलाज हुआ?
क्यों परिजनों को बच्ची से दूर रखा गया?
हालत बिगड़ने तक सच क्यों छिपाया गया?
मृतप्राय हालत में रेफर कर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश क्यों?
गुस्से में परिजन, सख्त कार्रवाई की मांग,
परिजनों ने डॉक्टरों और स्वास्थ्य स्टाफ पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाते हुए शासन-प्रशासन से कठोर कार्रवाई की मांग की है, ताकि भविष्य में कोई और परिवार इस दर्द से न गुजरे।
कटु सच्चाई,
सीधी जिला अस्पताल की बदहाल व्यवस्था अब लोगों की जान पर भारी पड़ रही है।
इलाज के नाम पर लापरवाही, जिम्मेदारी से बचने के लिए रेफर का खेल, और मरीजों से अमानवीय व्यवहार—ये सब मिलकर एक खतरनाक सिस्टम बना चुके हैं।
सवाल अब भी खड़ा है—
क्या अस्पताल इलाज का केंद्र है या मौत का दरवाजा,
