
सीधी जिले के बहुचर्चित जिला अस्पताल बदहाली मामले में आखिरकार स्वास्थ्य विभाग को कदम उठाना पड़ा है। जिस सिविल सर्जन डॉ. एस.बी. खरे को लेकर महीनों से गंभीर आरोप, विरोध और आंदोलन चल रहे थे, उन्हें अब शासन के आदेश से सीधी से हटाकर रीवा संभाग स्वास्थ्य सेवाएं कार्यालय में पदस्थ कर दिया गया है। वहीं डॉ. कमल मान प्रजापति को जिला अस्पताल सीधी का प्रभार सिविल सर्जन सह मुख्य अस्पताल अधीक्षक सौंपा गया है।
यह आदेश मध्यप्रदेश शासन, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा 02 फरवरी 2026 को जारी किया गया है।
कालिख कांड से मचा था प्रशासनिक भूचाल
गौरतलब है कि शिवसेना प्रदेश उपाध्यक्ष विवेक पांडे ने कुछ दिन पहले जिला अस्पताल सीधी के सिविल सर्जन डॉ. एस.बी. खरे पर कालिख पोतकर विरोध दर्ज कराया था। यह कोई सामान्य विरोध नहीं था, बल्कि जिला अस्पताल में व्याप्त कथित भ्रष्टाचार, अव्यवस्था और मौतों के सिलसिलेवार आरोपों का विस्फोट था।
कालिख पोतने के बाद विवेक पांडे ने खुद को जमोड़ी थाना में सुपुर्द किया, जिसके बाद उन्हें जेल भेज दिया गया। शिवसेना ने इसे “जनता की आवाज का दमन” करार दिया था।
ये थे वो गंभीर आरोप, जिनसे हिला जिला अस्पताल
विवेक पांडे और शिवसेना द्वारा लगाए गए आरोप बेहद संगीन थे—
आउटसोर्स भर्ती घोटाला,
करोड़ों रुपये कागजों में खर्च दिखाकर गबन,
मुर्दा व्यक्ति को रेफर करने जैसे अमानवीय कृत्य,
बिना इलाज रोज मरीजों की मौत,
अस्पताल के बाहर रोज चक्का जाम की स्थिति,
ऑक्सीजन पाइपलाइन लीक से शिवसेनिक सदस्य की मौत,
पार्किंग में गुंडागर्दी और अवैध वसूली,
वार्डों और बाथरूम में गंदगी व गंदा पानी,
ड्यूटी टाइम में प्राइवेट प्रैक्टिस।
इन सभी मुद्दों को लेकर जिला प्रशासन को कई बार लिखित शिकायतें दी गईं, लेकिन सुधार की जगह हालात और बदतर होते चले गए।
प्रशासन पर भी उठे सवाल
सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब हालात इतने भयावह थे, तब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
आरोप यह भी लगे कि जिला प्रशासन ने कई बार एकतरफा कार्रवाई कर सिविल सर्जन को बचाने का प्रयास किया।
विधायक रीति पाठक का बयान
इस पूरे मामले में सीधी विधायक रीति पाठक भी पहले ही साफ कह चुकी हैं कि—
“जिला अस्पताल की व्यवस्था पूरी तरह बेपटरी है, अस्पताल घुटनों के बल चल रहा है।”
देर से सही, लेकिन कार्रवाई तो हुई
अब सवाल यह है कि—
क्या यह कार्रवाई कालिख कांड और जनआक्रोश का नतीजा है,
क्या पहले कार्रवाई होती तो जानें बच सकती थीं?
क्या सिर्फ तबादला ही पर्याप्त है या विस्तृत जांच और जवाबदेही तय होगी,
फिलहाल इतना तय है कि देर से सही, लेकिन शासन को आखिरकार हरकत में आना पड़ा।
अब जनता की निगाहें इस पर टिकी हैं कि आगे सिर्फ कुर्सी बदलेगी या व्यवस्था भी बदलेगी?